Monday, August 15, 2016

न जी भर के देखा न कुछ बात की / बशीर बद्र



न जी भर के देखा न कुछ बात की
बड़ी आरज़ू थी मुलाक़ात की

कई साल से कुछ ख़बर ही नहीं
कहाँ दिन गुज़ारा कहाँ रात की

उजालों की परियाँ नहाने लगीं
नदी गुनगुनाई ख़यालात की

मैं चुप था तो चलती हवा रुक गई
ज़ुबाँ सब समझते हैं जज़्बात की

सितारों को शायद ख़बर ही नहीं
मुसाफ़िर ने जाने कहाँ रात की

मुक़द्दर मेरे चश्म-ए-पुर'अब का
बरसती हुई रात बरसात की

सीने में जलन / शहरयार


सीने में जलन आँखों में तूफ़ान सा क्यूँ है 
इस शहर में हर शख़्स परेशान सा क्यूँ है 


दिल है तो धड़कने का बहाना कोई ढूँढे 
पत्थर की तरह बेहिस-ओ-बेजान सा क्यूँ है 


तन्हाई की ये कौन सी मन्ज़िल है रफ़ीक़ो
ता-हद्द-ए-नज़र एक बयाबान सा क्यूँ है 


हम ने तो कोई बात निकाली नहीं ग़म की
वो ज़ूद-ए-पशेमान पशेमान सा क्यूँ है


क्या कोई नई बात नज़र आती है हम में 
आईना हमें देख के हैरान सा क्यूँ है 

किया इरादा बारहा तुझे भुलाने का / शहरयार

किया इरादा बारहा तुझे भुलाने का 
मिला न उज़्र ही कोई मगर ठिकाने का 


ये कैसी अजनबी दस्तक थी कैसी आहट थी 
तेरे सिवा था किसे हक़ मुझे जगाने का 


ये आँख है कि नहीं देखा कुछ सिवा तेरे 
ये दिल अजब है कि ग़म है इसे ज़माने का 


वो देख लो वो समंदर ख़ुश्क होने लगा 
जिसे था दावा मेरी प्यास को बुझाने का 


ज़मीं पे किस लिये ज़ंजीर हो गये साये 
मुझे पता है मगर मैं नहीं बताने का 

Tuesday, August 2, 2016

उम्र भर जुल्फ-ए-मसाऐल यूँ ही सुलझाते रहे / अनवर जलालपुरी


उम्र भर जुल्फ-ए-मसाऐल यूँ ही सुलझाते रहे
दुसरों के वास्ते हम खुद को उलझाते रहे

हादसे उनके करीब आकर पलट जाते रहे
अपनी चादर देखकर जो पाँव फैलाते रहे

जब सबक़ सीखा तो सीखा दुश्मनों की बज़्म से
दोस्तों में रहके अपने दिल को बहलाते रहे

मुस्तक़िल चलते रहे जो मंज़िलों से जा मिले
हम नजूमी ही को अपना हाथ दिखलाते रहे

बा अमल लोगों ने मुस्तक़बिल को रौशन कर लिया
और हम माज़ी के क़िस्से रोज़ दोहराते रहे

जब भी तनहाई मिली हम अपने ग़म पे रो लिये
महफिलों में तो सदा हंसते रहे गाते रहे

ख्वाहिश मुझे जीने की ज़ियादा भी नहीं है / अनवर जलालपुरी



ख्वाहिश मुझे जीने की ज़ियादा भी नहीं है
वैसे अभी मरने का इरादा भी नहीं है

हर चेहरा किसी नक्श के मानिन्द उभर जाए
ये दिल का वरक़ इतना तो सादा भी नहीं है

वह शख़्स मेरा साथ न दे पाऐगा जिसका
दिल साफ नहीं ज़ेहन कुशादा भी नहीं है

जलता है चेरागों में लहू उनकी रगों का
जिस्मों पे कोई जिनके लेबादा भी नहीं है

घबरा के नहीं इस लिए मैं लौट पड़ा हूँ
आगे कोई मंज़िल कोई ज़ियादा भी नहीं

बेदिली क्या यूँ ही दिल गुज़र / जॉन एलिया

बेदिली! क्या यूँ ही दिन गुजर जायेंगे 
सिर्फ़ ज़िन्दा रहे हम तो मर जायेंगे

ये खराब आतियाने, खिरद बाख्ता
सुबह होते ही सब काम पर जायेंगे

कितने दिलकश हो तुम कितना दिलजूँ हूँ मैं 
क्या सितम है कि हम लोग मर जाएंगे

Sunday, July 31, 2016

क्या तकल्लुफ करे ये कहने में / जॉन एलिया


उसके पहलू से लग के चलते हैं
हम कहाँ टालने से टलते हैं

मैं उसी तरह तो बहलता हूँ यारों
और जिस तरह बहलते हैं

वोह है जान अब हर एक महफ़िल की
हम भी अब घर से कम निकलते हैं 

क्या तकल्लुफ़ करें ये कहने में 
जो भी खुश है हम उससे जलते हैं 

है उसे दूर का सफ़र दरपेश
हम सँभाले नहीं सँभलते हैं

है अजब फ़ैसले का सहरा भी 
चल न पड़िए तो पाँव जलते हैं 

हो रहा हूँ मैं किस तरह बर्बाद 
देखने वाले हाथ मलते हैं 

तुम बनो रंग, तुम बनो ख़ुशबू 
हम तो अपने सुख़न में ढलते हैं